स्वाध्याय में प्रमाद ना करो । नित्य स्वाध्याय करो । अच्छी पुस्तकों का पठन करो । यही सच्चे मित्र हैं ।
सत्संग,
भगवान की शरण में जानेका अर्थ है भगवान की आज्ञा में रहना, उन्हीं के आदेशों के अनुसार जीना । भक्ति मार्ग के अनुरूप यही सरल उपाय है । भक्ति में आसक्ति तो है, लेकिन प्रभु में । भगवान में हुई आसक्ति का नाम है तीव्र भक्ति । इसी तीव्र भक्ति के चलते संसार की आसक्ति छूट जाती है जो दुःख का कारण है ।
सत्संग,
सत्संग से भावना की शुद्धि होगी । फिर विचार शुद्ध होंगे, वैसे ही कर्म शुद्ध होंगे । चरित्र शुद्ध होगा और फिर जीवन ही शुद्ध हो जाएगा । कलिकाल में शुद्धि
सत्संग,
मोह् के रहते हुए प्रभु के चरणों में दॄढ़ अनुराग नहीं होता और बिना सत्संग के मोह नहीं मिटता । अतः मनुष्य के जीवन में सत्संग का सातत्य चाहिए ।
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