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विचार मंथन…!!

कलौ केशव कीर्तनात..!!(भागवत)

(1) सतयुग मे पाप का फल तत्क्षण मिलता है  ।।
(2) त्रेतायुग मे पाप का फल बारहवे दिन में मिलता है ।।
(3) द्वापरयुग मे पाप का फल एक महीने के बाद मिलता है ।।
(4) कलियुग मे पाप का फल एक वर्ष के बाद मिलता है ।।

 इस से विपरीत ” कलियुग ” में धर्म की सिद्धि तत्काल होती है ।।

इसलिए  भगवदीय गाते है की

“” कलियुग सब युग ते अधिकाई “”

श्री मद भागवत के अनुसार कलियुग भगवद भजन कीर्तन सेवा सत्संग के लिए  सर्वोत्तम युग है ।।

– गो.हरिराय(कड़ी-अहमदाबाद-सूरत)

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विचार मंथन…..!!

जिव तिन प्रकार के होते हे ।
(1) सन्मुख
(2) विमुख
(3) बर्हिमुख

जो वैष्णव पुष्टि प्रकार से भगवान श्री कृष्ण की सेवा एवं गुरुवर्य श्री वल्लभकुल की सेवा करते है वह सन्मुख जिव हे ।। जो कृष्णसेवा,गुरुसेवा नहीं करते वह विमुख जिव है ।। एवं भगवान ने जिन्हें त्याग दिया हे अंगीकार नहीं किया वे बहिर्मुख जिव कहे जाते हे ।। जो इस संसार में अभागी जीव् है।।
प्रियजन हम पुष्टि जिव बड़े बडभागी है जिनको श्री वल्लभ ने अपनी शरण में लेके कृष्णसेवा का अधिकार दिया । हम जेसे ” बर्हीमुख ” जीवो को अपने अनुग्रह से ” सन्मुख ” किया  फिर हम      एसे महोदार महाकारुणीक प्रभु एवं महाप्रभु से ” विमुख ” क्यों होवे !!

” अपने जीवन में संसार से विमुखता एवं श्रीवल्लभ से ” सन्मुखता ” बनाय  रखो..!!

– गो.हरिराय(कड़ी-अहमदाबाद-सूरत)

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विचार मंथन…!!

सूत्र – ” शुद्रा एति भगवव्दिरोधित्वम ”

अर्थ- भगवद धर्म से विपरीत चलने वाले को अब्रह्मण्य शब्द के द्वारा सूचित किया गया हे! भगवान के विरोधियों को ही शुद्र कहा गया है! जाती से केवल कोई शुद्र नही है श्रुति मे कहा गया हैं की ” असुर ही शुद्र हैं ”

– संकलन-गो.हरिराय(कड़ी)

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विचार मंथन

सूत्र – ” शुद्रा एति भगवव्दिरोधित्वम ”

अर्थ- भगवद धर्म से विपरीत चलने वाले को अब्रह्मण्य शब्द के द्वारा सूचित किया गया हे! भगवान के विरोधियों को ही शुद्र कहा गया है! जाती से केवल कोई शुद्र नही है श्रुति मे कहा गया हैं की ” असुर ही शुद्र हैं ”

– संकलन-गो.हरिराय(कड़ी)

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