Author Archives: Hariray Goswami

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About Hariray Goswami

I am the 17th descendent of SHRI MAHAPRABHUJI who is the founder of "SHUDDHADVAIT PUSHTIBHAKTI MARG..

विचार मंथन

सूत्र – ” शुद्रा एति भगवव्दिरोधित्वम ”

अर्थ- भगवद धर्म से विपरीत चलने वाले को अब्रह्मण्य शब्द के द्वारा सूचित किया गया हे! भगवान के विरोधियों को ही शुद्र कहा गया है! जाती से केवल कोई शुद्र नही है श्रुति मे कहा गया हैं की ” असुर ही शुद्र हैं ”

– संकलन-गो.हरिराय(कड़ी)

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गुरु पूर्णिमा

” पुष्टिमार्गीय सर्वज्ञ करुणा रस पूरित।
श्रेष्ठ फल प्रदाता च तस्मै श्री गुरुवे नम: !!

गुरु पूर्णिमा (व्यास जयंती) की समस्त सनातन वैष्णव सृष्टि को मंगल बधाई एवं शुभकामनाए..!
गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व ये की इसदिन व्यास जी का जनम दीन हे इसलिए मर्यादा में शिष्य गुरु स्वरुप का पूजन अर्चन वंदन करते हे खासकर इसदिन लेकिन पुष्टि परंपरा में नित्य गुरु स्वरुप श्रीवल्लभ की सेवा सेवक को करनी हे यह उसका धर्म हे पुष्टि में तो नित्य गुरु पूर्णिमा हे..!! फिरभी जो सेवक नित्यं सेवा नहीं पहुचता उन जीवो के लिए पुष्टि में ” पवित्रा बारस उत्सव ” ही गुरु पूर्णिमा के समान हे उसदिन शिष्य पु.गुरुजन को वर्ष की सेवा के रूप पवित्रा धराते हे मिश्री आरोगाते हे और भेट धरते हे और गुरुजनों से आशीर्वाद प्राप्त करते हे!! यह पुष्टि परम्परा हे!!अस्तु!!

आजके समय में लोग गुरु को मानते हे लेकिन गुरु के वचनों को नहीं मानते इसलिए जीवन में अशांति है!!

-गो.हरिराय(कड़ी)

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आरती क्यों वाकी भावना..!!

” अमंगलम निवृत्यर्थ मंगलावाप्तये तथा,
कृत्मारार्तिकं तेन प्रसिध्द: पुरुषोत्तम: !!

चार प्रहर की चार आरती होवे हे।

* रात्रि के दोष परिहार,निशाचरन की द्रष्टि निवारणार्थ “मंगला आरती”

* वन वन प्रभु धूमे ठोर कुठोर चरण पड़े तासो संध्या घर पधार्वे पर माता जसोदा ” संध्या आरती” करे हे।

* राजभोग में निकुंज व्रजललना दोनों स्वरूप न की आरती करे हे

* शयन में भी व्रजललना प्रभु कु शैया मंदिर में बिठाय के आरती उतारे हे।

आरती बार बार उतारे क्यों की प्रभु बालक हे उनकू नजर लग जाय या  वात्सल्य भाव सु ” दोष परिहार ” आरती होवे हे..!!

* आरती – आ + रति
अकार कृष्ण वाचक हे। रति यानि स्नेह,प्रेम,
– कृष्ण में रति प्रेम ही आरती हे..!!

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चातुर्मास प्रारंभ…!!

Vaman avtarतन ही राख सत्संग मैं, मन ही प्रेम रस भेव |
सुख चाहत हरिवंश हित, कृष्ण कल्पतरु सेव ||

 देव शयनी एकादशी  के आशीर्वाद…!!

आज चातुर्मास का आरम्भ हुआ.. चातुर्मास ४ महीने कि अवधि है जो आषाढ़ शुक्ल एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक मनाया जाता है.
आज से भक्तवत्सल प्रभु अपना वचन निभाने बलिराजा के वहां पाताललोक में पधारे हे.. हमारे शास्त्रों के अनुसार इस मास में भगवन योग निंद्रा में विश्राम करते हे इसलिए  यह मास में वैदिक कार्य विवाह,यज्ञोपवित,गृह प्रवेश आदि नहीं होते इसलिए यह मास भगवद कार्य का हे..सेवा सत्संग कथा यात्रा स्मरण इन चातुर्मास में विशेष फलदाई हे…!! यह मास भक्तिमास हे ..!!

पौराणिक कथा कुछ इस प्रकार है:
एक बार असुरराज विरोचन के पुत्र बाली ने अश्वमेघ यज्ञ करके बहुत पुण्य अर्जित कर लिया और सभी दैत्य देवताओं से उच्च श्रेणी में पहुच गए  और इन्द्र से उनका सिंघासन छीन लिया गया. इन्द्र सभी देवताओं सही भगवन नारायण की शरण में गए और भक्तवत्सल भगवान ने उन्हें वचन दिया कि कि वो उनकी सहायता करेंगे. प्रभु ने एक छोटे से बालक का वामन अवतार धारण किया और साथ में शिवजी ने भी बाल रूप धरा और बटुक भैरव के नाम से विख्यात हुए. वामन भगवान राजा बलि के द्वार पर पहुंचे और उनसे तीन पग भूमि का दान माँगा. यह कथा हम सबने पूज्य गुरुदेव के श्री मुख से सुनी है. तो भगवान ने अपना तीसरा चरण राजा बलि के सिर पे रखा तो उसे नर्क में प्रभु ने धकेल दिया और पाताल लोक का राज्य भी दे दिया. बलि की सच्चाई से प्रसन्न होकर वामन भगवान ने उसे एक वर मांगने को कहा तो राजा बलि ने ठाकुर जी से यह विनती की कि वो माँ लक्ष्मी सहित उनके साथ साल के तीसरे हिस्से के लिए रहें अर्थार्थ प्रभु को अपनी वामंगिनी सहित एक तिहाई साल के लिए (४ महीने) राजा बलि के साथ रहना था. प्रभु ने उसकी मनोकामना पूर्ण की और इसी चातुर्मास में प्रभु राजा बलि के साथ पाताल लोक में निवास करते हैं. इसलिए चातुर्मास के प्रारंभ को देवशयनी एकादशी कहा जाता है और अंत को देवोत्थान एकादशी.

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