Author Archives: Hariray Goswami

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About Hariray Goswami

I am the 17th descendent of SHRI MAHAPRABHUJI who is the founder of "SHUDDHADVAIT PUSHTIBHAKTI MARG..

विचार मंथन…!!

वाणी  ज़िह्वा..!! 

लक्ष्मीर्वसति जिह्वाग्रे, जिह्वाग्रे मित्रशत्रव: ।
जिह्वाग्रे बन्धमौक्षी च जिह्वाग्रे मरणम ध्रुवं ।।

ज़िह्वा के अग्र भाग में लक्ष्मी का वास है, एवं मित्र और शत्रु भी वही बसते है, जिह्वा के द्वारा बोली हुई प्रिय और मधुर वाणी ही मित्र बनाती है एवं जिह्वा द्वारा कहे गए कटु वचन ही शत्रुओ को न्योता देती है..!!

जिह्वा ( वाणी) ही हमारे बंधन और मोक्ष (मुक्ति) का कारण रूप है..!!

कटू जिह्वा ( वाणी) ही हमारे संसार में कुरुक्षेत्र का निमार्ण करती है एवं  मधुर वाणी ही हमको दिव्य वृंदावन का अनुभव कराती है…!!

  ” लब्ज़ ही ऐसी  चीज़  है
       जिसकी वजह  से  इंसान
    या  तो  दिल  में  उतर  जाता  है
       या दिल से उतर  जाता  है ”

जिह्वा का दूसरा कार्य स्वाद है…!!जिह्वा को जब  विविध रस के स्वाद का चसका लगता है तब वही अति स्वाद के लोभ से हमारे शरीर में रोगों को आमंत्रित करती है..!

जिह्वा ( वाणी) ही हमारे जीवन में सुख एवं दुःख का कारण है..!!

पानी एवं वाणी का सदुपयोग करे..!!

ऐसी वाणी बोलिए  जो मन का आपा होय ओरन को शीतल करे आपहु शीतल होय…!!

वाणी गुणानु कथने श्रवणो कथायां…!! (श्रीमदभागवत)

अर्थ – मेरी ज़िह्वा (वाणी) सदा भगवद गुणानुगान गाती रहे एवं मेरी श्रवणेन्द्रिया श्रीहरी की कथा का सदा श्रवण करती रहै..!!

बस यही बात को ध्यान में रखते हुए आवो हम हमारी वाणी को विष रूप नहीं पर उसमे मिश्री सी मिठास एवं मध् सी मधुरता धोलकर ” अमृत ” के समान बनावे जिससे हमारे संग सभी  का कल्याण हो…!!

लेखन – गो.हरिराय…!!
(कड़ी-अहमदाबाद-सूरत) 

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विचार मंथन…!! रासलीला

रासलीला मनोभाव प्रकाश…!!

गोपी कृष्ण प्रेम की मूर्ति है..!!
हमारा ह्रदय वृंदावन है , आत्मा श्री कृष्ण है , अंत:करण की वृतिया ही गोपियाँ है , शांत शीतल पूर्ण प्रसन्न साधक का जो मन है वह पूर्णिमा का चंद्रमा है ( चंद्र मन के देव है ) भीतर से जो परम प्रेम की भक्ति की जो धारा बह रही है वही श्री यमुनाजी है , अंत: से उठता हुआ अनाहत नाद ही श्री कृष्ण की वेणु का स्वर है..!! 

और उस नाद को सुनकर के अंत:करण की वृति रूपी गोपियाँ अंतर मुख होकर के जो बहिर्मुख थी संसार में थी वृतिया वह अंतर मुख होकर के आत्मा रूपी श्री कृष्ण से रमण करने दोड़ती है , ह्रदय रूपी वृन्दावन में जाती है, रमण करती है  ” श्री कृष्ण मय ” हो जाती है..!! यानि वृतियों का विलय  हो जाता है आत्मा में उसी को योग में समाधि कहते है…!! वही ” रास ” है..!!

यह रास जीवात्मा और परमात्मा का मिलन है..!! 

अब विचार करे क्या हमारी  अंत:करण की वृतिया ” श्री कृष्णमय ” है…!! जो उत्तर हा है तो हमारा प्रभु के संग रास आज भी चल रहा है..!!

गो.हरिराय…!!
(कड़ी-अहमदाबाद-सूरत-मुंबई) 

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Saurastra Baithakji Yatra – 2014

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गोपाष्टमी उत्सव की मंगल बधाई..!!

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