विचार मंथन….!!

” तुलना ” आज मानव स्वभाव तुलना करने वाला हो गया है, भौतिक  जीवन में ठीक है की हम वस्तु , व्यक्ति एवं स्थान की तुलना करके उसे स्वीकार करते है लेकिन ” आध्यात्म ” मे क्या यह सही है ? हम  धर्म, तीर्थस्थान, वैष्णव, संत,संप्रदाय, गुरुजनों की तुलना एक दुसरे से करते..हम एक की प्रशंसा करते करते कब दुसरे की निंदा में लग जाते है इसका हमको स्मरण भी नहीं रहेता..!!क्या यह उचित है ? आगे आप स्वयं विचार करे..!!
-गो हरिराय(कड़ी-अहमदाबाद-सूरत)

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